जेन ज़ी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका ने संस्कारी दल की कुंठा को बेनकाब किया

जंतर मंतर पर हुए जेन जी प्रदर्शन के दौरान महिलाओं की नयी राजनीतिक चेतना, निर्णय क्षमता और नेतृत्व की भूमिका पर जिस तरह की प्रतिक्रिया संस्कारी दल से आई है उसने संस्कारी दल की कुंठा, विकृत दृष्टिकोण और विक्षिप्त मनोस्थिति को फिर से बेनकाब  कर दिया है। 

जिस लौ को बुझाने के प्रयत्न पिछले कई दशकों से संस्कारी दल द्वारा किये जा रहे थे उस लौ ने अपने विरोध की  तीव्र अभिव्यक्ति से  सड़क पर निरकुंशता को थामने के लिए केवल एक हाथ के प्रयोग से सता को विचलित कर दिया। रिया अहीर की तस्वीर केवल एक युवती के हौसले को चिन्हित नहीं करती बल्कि इस देश में नारी शक्ति का प्रतीक बन गई है।  

तुलसी के रूप से अन्नपूर्णा तक नारी गरिमा का गुणगान करने वाले उसके विरोध पर विलाप करने में चूक नहीं रहे। राजनीतिक महत्वाकांक्षा को चुनौती मिलते ही पूरा वर्ग एक नया दुश्मन दिखाई देने लगा है। शिष्टता और औपचारिकता के दायरे से बाहर आ कर नेतृत्व और निर्णय की भूमिका में नारी को स्वीकार करने में इनकी पीड़ा इनके वर्चस्व को चुनौती देती हुयी उजागर होती है।

पाखंड को ललकारती हुयी नारी को यह विचारधारा पूरी तरह ख़ारिज करने पर तुल गई है। संघर्ष को एक अर्थ देती हुयी नारी के सम्मान को खंडित करने के लिए विचारक और चिंतकों की फ़ौज उतर आयी है। निसंदेह एक व्यक्तित्व केवल देह से नहीं बल्कि उसकी ऊर्जा,  विचारों और भावों से ही निहित होता है लेकिन संकीर्णता की दृष्टि केवल आकार ही देख पाती है। 

काल्पनिक राष्ट्र की अवधारणा पाले हुए यह प्रवृत्ति लैंगिक गुणों अवगुणों से वैयक्तिक श्रेठता-जड़ता सिद्ध करने के विकार से सामाजिक वैमनस्य को गहरा करने की कुंठित विचारधारा का अंग ही है। पूर्वाग्रह ग्रसित पक्षपातीय दृष्टिकोण न केवल लोकतंत्रिक मूल्यों को ख़ारिज करता है बल्कि अनावश्यक अतार्किकता के बल पर सामान्य सर्वविदित विचार को मिटाने पर उतारू रहता है।

इसके मूल में वास्तविकताओं के विपरीत कुटिल छद्मता की आकांक्षा सक्रिय रहती है जिसे सत्ता प्राप्ति और वर्चस्व बनाने के लिए उपयोग किया जाता है । 

वर्तमान जेन जी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पूरे देश में व्यापक और अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, आंदोलन में छात्राओं, युवा पेशेवरों और विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों की महिलाओं ने सक्रिय भागीदारी की है। कई स्थानों पर महिलाओं ने धरनों, जनसभाओं और संवाद कार्यक्रमों के आयोजन में प्रमुख भूमिका निभाई। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी साझा करना, पोस्टर, वीडियो और लाइव प्रसारण के माध्यम से आंदोलन की पहुंच बढ़ाई। 

महिलाओं की उपस्थिति ने आंदोलन को व्यापक सामाजिक समर्थन दिलाने में सहायता की। महिलाओं ने केवल मूल मांगों तक सीमित न रहकर शिक्षा, सुरक्षा, समान अवसर और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को भी उठाया।

बड़ी संख्या में छात्राओं ने धरनों और रैलियों में भाग लिया। महिला स्वयंसेवकों ने चिकित्सा सहायता, भोजन वितरण, मीडिया समन्वय और मंच संचालन जैसे कार्य संभाले। महिला प्रतिभागियों की उपस्थिति ने आंदोलन को केवल छात्र आंदोलन न रहकर व्यापक सामाजिक आंदोलन का स्वरूप देने में मदद की। कुछ घटनाओं में महिला प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर भी विवाद सामने आए।

इस प्रदर्शन ने प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं से व्यापक असंतोष के कारण धीरे धीरे पूरे देश में आकार ले लिया। डिजिटल माध्यम और सोशल मीडिया इंस्टाग्राम, एक्स, टेलीग्राम, व्हाट्सएप के माध्यम से तेज़ी से जनसंपर्क और व्यापक संदेश विस्तार हुआ। आंदोलन का किसी एक जाति, धर्म या क्षेत्र तक सीमित न रहना भी इसके स्वरूप को विस्तृत करने में सहायक बना। शांतिपूर्ण प्रदर्शन की रणनीति ने आंदोलन को धरातल पर खड़ा किया । 

लोकतंत्र में सामाजिक समूहों के अनिवार्य हितों का दायरा विस्तृत रूप से आखिरी इकाई तक फैला हुआ होता है जिसका प्रतिनिधित्व ऐच्छिक रूप से चुने हुए जन नेताओं द्वारा नहीं किया जाता तब असंतोष गहराना स्वाभाविक है। समाज राजनीति तय करता है या राजनीति तय करती है कि समाज का क्या प्रारूप होगा और किस दिशा में जाएगा।

आज के युवाओं का समाज इतना अशांत है या भ्रम की परिधि से बाहर की समझ है या कहीं ये बहुत समय से दबा हुआ आक्रोश है जो शायद प्रतिकूल व्यवस्थाओं पर यूँ आंदोलित होता है ! एक तरह की कोफ्त  समाजिक धारा में बह तो रही है इसमें अब संदेह नहीं।  जब जब राजनीति ने समाज की दिशा तय करने की कोशिश की है नतीजे उसके प्रतिकूल ही रहे है। 

 राजनैतिक अक्षमताओं और अकर्मण्यता का दंड देश का युवा क्यों भुगते? ये सवाल एक बड़ा सवाल है।

(जगदीप सिंह सिंधु वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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